अमलेश्वर। बेमेतरा। अमलेश्वर। छत्तीसगढ़ की माटी , संस्कृति और साहित्य की पहिचान छत्तीसगढ़ी भाषा को लेकर बेमेतरा में विगत दिवस साहित्य व संस्कृति का अनूठा संगम देखने को मिला। छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के दसवें प्रांतीय सम्मेलन के प्रथम दिवस साहित्यकारों और जनप्रतिनिधियों व भाषा प्रेमियों ने छत्तीसगढ़ी को जन जन की भाषा बनाने के साथ ही इसे भारतीय लोकतंत्र में व्यापक स्थान दिलाने की बात कही।
कार्यक्रम के शुभारंभ अतिथियों के स्वागत और आकर्षक आदिवासी नृत्य की प्रस्तुति के साथ हुआ । कार्यक्रम में मुख्य अतिथि दुर्ग लोकसभा सांसद विजय बघेल , विधायक दीपेश साहू, पूर्व विधायक अवधेश सिंह चंदेल, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष प्रभात मिश्रा, नगर पालिका अध्यक्ष विजय सिन्हा, और डॉ शशि दुबे सहित साहित्य एवं कला जगत से जुड़े लोग मौजूद रहे। नगर पालिका अध्यक्ष विजय सिन्हा ने कहा कि छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग द्वारा बेमेतरा में आयोजित यह आयोजन जिले के गौरव में वृद्धि करने वाला है। उन्होंने छत्तीसगढ़ भाषा और साहित्य को आगे बढ़ाने के लिए ऐसे आयोजनों को महत्वपूर्ण बताया। वरिष्ठ साहित्यकार सी पी तिवारी सावन, डॉ गोकुल बंजारे चंदन बेमेतरा सहित प्रदेश के बारह साहित्यकारों का सम्मान किया गया है। पूर्व विधायक अवधेश सिंह चंदेल ने कहा कि किसी आयोजन में बुजुर्गों का सम्मान होता है तो आयोजन में चार चांद लग जाते हैं। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ी केवल सामान्य बोलचाल की भाषा नहीं बल्कि हृदय की भाषा बननी चाहिए। साहित्यकारों से अधिक भाषा के प्रति जागरूकता पैदा करने का कार्य कोई और नहीं कर सकता। विधायक दीपेश साहू ने कहा कि भाषा और साहित्य के विकास के लिए वे सदैव तत्पर हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ी भाषा और यहां की साहित्य परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए सामुहिक प्रयास की आवश्यकता बताई।
पुरखा के सुरता में याद किए छत्तीसगढ़ के साहित्य पुरोधा:-
प्रथम सत्र का संचालन विजय मिश्रा अमीत ने किया। द्वितीय सत्र में पुरखा के सुरता कार्यक्रम शुरू हुआ, जिसका संचालन राघवेंद्र दुबे ने किया। इस सत्र में छत्तीसगढ़ के प्रथम जनकवि कोदू राम दलित के साहित्य योगदान को याद किया गया। छंद के छ के संस्थापक अरुण कुमार निगम ने उनकी चर्चित रचना जैसे मुसुवा निकलथे बिल ले वइसे कविता निकलथे दील ले, सहित उनकी कई रचनाओं का सारगर्भित उल्लेख किया। पद्मश्री डॉ सुरेंद्र दुबे की स्मृति में उनकी धर्मपत्नी शशी दुबे ने उनकी रचनाओं का पाठ किया। और उनके संघर्ष पूर्ण साहित्य जीवन को याद किया। वहीं छत्तीसगढ़ के राजगीत अरपा पैरी के धार महानदी हे अपार के रचयिता डॉ नरेंद्र देव वर्मा को वरिष्ठ साहित्यकार डॉ परदेशी राम वर्मा ने याद करते हुए उनके साहित्यिक योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला।
साहित्यकारों की रही मौजूदगी
सम्मेलन के प्रथम दिवस छत्तीसगढ़ भाषा आयोग की सचिव डॉ अभिलाषा बेहार , जिला समन्वयक हास्य-व्यंग्य कवि रामानंद त्रिपाठी, गीतकार किशोर तिवारी, गीतकार मीर अली मीर, हास्य कवि कृष्णा भारतीय, जगदीश सोनी, डॉ गोकुल बंजारे चंदन, पद्मलोचन शर्मा मुहफट, डॉ राजेंद्र पाटकर, नारायण प्रसाद वर्मा चंदन, ईश्वर साहू आरुग, पंकज शर्मा, मधु तिवारी आदर्श दुबे, सुषमा गौराहा, विकास कश्यप, कमलेश वर्मा, खीवराज धीवर, मनोज पाटिल मणि,भुवन दास जांगड़े,ताकेश्वर साहू, संतोष साहू, नीतिन देवी, दीलिप टिकरिहा, दीपक निषाद,मनीदास मानिकपुरी, गायत्री श्रीवास, जलेश्वर दास मानिकपुरी, राजकुमार निषाद राज सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार एवं भाषा प्रेमी मौजूद रहे।
खूबचंद बघेल से अटल बिहारी वाजपेई तक की भूमिका याद की
लोक सभा सांसद विजय बघेल ने अपने संबोधन में पद्मश्री डॉ सुरेंद्र दुबे को याद करते हुए कहा कि उन्होंने छत्तीसगढ़ी भाषा में कविता के माध्यम से देश दुनिया में अपनी पहचान बनाई। उन्होंने छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के पीछे साहित्य और कविताओं की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ राज्य के प्रथम स्वप्न दृष्टा डॉ खूबचंद बघेल कवि थे, उन्होंने मजदूरों के संगठन के माध्यम से पृथक छत्तीसगढ़ राज्य की मांग को आगे बढ़ाया। सांसद ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री एवं भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी ने एक कवि की मन की भावना को समझा और छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण कर उसे छत्तीसगढ़ वासियों को समर्पित किया। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए उन्होंने लोक सभा में अपनी बात रखी है। छत्तीसगढ़ी भाषा को भारतीय लोकतंत्र में उचित स्थान मिले इसके लिए सभी संघर्ष रत है, इस दौरान उन्होंने जन कवि लक्ष्मण मस्तुरिया को भी याद किया। और उनका लोक प्रिय गीत मोर संग चलौ रे सुमधुर ढंग से प्रस्तुत किया।







