अम्लेश्वर। अम्लेश्वर के कई स्थानों पर वट सावित्री पूजा की धूम रही, इस पूजा में माताएं माथे पर लंबी सिंदूर की रेखा, हाथों में पूजा की डलिया, रंग-बिरंगे सजे तार के पंखे और बरगद के पेड़ के नीचे उमड़ती सुहागिन महिलाओं की भीड़। आज वट सावित्री पूजा को लेकर अमलेश्वर तथा आसपास के गांव में वट सावित्री पूजा की रौनक रही माताएं परंपरागत धार्मिक परिधान में तैयार होकर पूजा की।
अम्लेश्वर के काली मंदिर, कबीर चौक , कर्मा चौक, शीतला मंदिर आदि स्थानों में काफी भीड़ देखने को मिली।
सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा:
* जन्म और विवाह: प्राचीन काल में मद्र देश के राजा अश्वपति ने देवी सावित्री की कठोर तपस्या करके एक तेजस्वी पुत्री का वरदान पाया。इस कन्या का नाम ‘सावित्री’ रखा गया。जब वह बड़ी हुई तो उसने साल्व देश के राजा द्युमत्सेन (जो अपना राज्य हार चुके थे) के गुणी पुत्र सत्यवान को अपना पति चुना。
* नारद जी की भविष्यवाणी: देवर्षि नारद ने राजा अश्वपति को बताया कि सत्यवान अल्पायु है और विवाह के ठीक एक वर्ष बाद उसकी मृत्यु हो जाएगी。पिता के समझाने पर भी सावित्री अपने निर्णय से नहीं डिगी और उसने सत्यवान के साथ ही विवाह किया。
* मृत्यु का दिन: विवाह के एक वर्ष पूर्ण होने के करीब आने पर सावित्री ने तीन दिन का उपवास शुरू कर दिया。निश्चित दिन सत्यवान जंगल में लकड़ी काटने गए, तो सावित्री भी उनके साथ गई。जंगल में सत्यवान के सिर में अचानक भयंकर दर्द हुआ और वह पेड़ से नीचे उतरकर सावित्री की गोद में सो गए。
* यमराज का आगमन: तभी मृत्यु के देवता यमराज वहां प्रकट हुए और सत्यवान के प्राणों को अपने पाश में बांधकर दक्षिण दिशा की ओर ले जाने लगे。सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ी。
* यमराज के वरदान: यमराज ने सावित्री को वापस लौटने को कहा, लेकिन वह अपने पति का साथ छोड़ने को तैयार नहीं थी。सावित्री की पति-भक्ति और बुद्धिमानी से प्रसन्न होकर यमराज ने उसे तीन वरदान मांगने को कहा—
* उसने सबसे पहले अपने सास-ससुर के खोए हुए राज्य और दृष्टि (आंखों की ज्योति) वापस मांगी。
* दूसरे वरदान में अपने पिता के लिए सौ पुत्र मांगे。
* तीसरे वरदान में सत्यवान के जीवन का वर मांगा, जिसे यमराज ने स्वीकार कर लिया。
* सत्यवान का पुनर्जीवन: सत्यवान के प्राण वापस आ गए और वे दोनों खुशी-खुशी अपने राज्य लौट गए。जिस वटवृक्ष के नीचे यमराज ने सावित्री को सत्यवान के प्राण लौटाए थे, उसी के आधार पर इस दिन वट वृक्ष की पूजा की परंपरा शुरू हुई।





