अंतरिक्ष में रूस की सैटेलाइट RESURS-P1 के तबाह होने से इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) पर खतरा पैदा हो गया है. सैटेलाइट के 100 से ज्यादा टूटे हुए हिस्से धरती की कक्षा में तेज रफ्तार में घूम रहे हैं. ऐसे में वैज्ञानिकों को चिंता है कि इन टुकड़ों से ISS समेत पृथ्वी की कक्षा में मौजूद बाकी सैटेलाइट को नुकसान हो सकता है. RESURS-P1 के टूटने की क्या वजह रही, इसकी अब तक पुष्टि नहीं हुई है. लेकिन 2022 में सैटेलाइट को मृत घोषित कर दिया था. इससे सवाल खड़ा होता है कि पुरानी सैटेलाइट के संचालन को लेकर क्या नियम हैं और अंतरिक्ष में सैटेलाइट्स का कब्रिस्तान कहां है.
अंतरिक्ष के मलबे पर नजर रख रहे अमेरिकी अंतरिक्ष कमांड ने कहा कि रूस की सैटेलाइट से किसी भी दूसरी सैटेलाइट को कोई खतरा नहीं है. यह घटना ISS के पास की कक्षा में हुई, जिसकी वजह से स्पेस स्टेशन के यात्रियों को करीब एक घंटे तक अपने अंतरिक्ष यान में शरण लेनी पड़ी. अमेरिका की राष्ट्रीय पर्यावरण उपग्रह, डेटा और सूचना सेवा (National Environmental Satellite, Data, and Information Service) की रिपोर्ट में बताया गया है कि सैटेलाइट के मृत घोषित होने पर उसका क्या होता है.
1950 के दशक से, इंसानों ने हजारों रॉकेट लॉन्च किए हैं और और उससे भी ज्यादा सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजे हैं. एक आंकड़े के मुताबिक, लगभग 2 हजाप एक्टिव सैटेलाइट पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे हैं, जबकि 3 हजार मृत सैटेलाइट भी अंतरिक्ष में गंदगी फैला रहे हैं. फिलहाल, अंतरिक्ष के कबाड़ से स्पेस एक्सप्लोरेशन पर कोई बड़ा जोखिम पैदा नहीं हुआ है. लेकिन इससे ऑर्बिट में मौजूद बाकी सैटेलाइट को लगातार खतरा बना हुआ है. इसके अलावा, खराब सैटेलाइट के अचानक धरती पर गिरने का खतरा भी रहता है. अगर ठीक से सैटेलाइट का संचालन न किया जाए, तो सैटेलाइट के टुकड़े रिहायशी इलाकों में नुकसान पहुंचा सकते हैं.पुरानी सैटेलाइट को लेकर क्या हैं नियम?बाकी सभी चीजों की तरह, सैटेलाइट भी हमेशा के लिए नहीं रहते. उनके पास सीमित ईंधन है और बाहरी अंतरिक्ष की कठोर परिस्थितियों उन पर टूट-फूट डाल सकती है. इसको ध्यान में रखकर संयुक्त राष्ट्र ने 2007 में कुछ दिशानिर्देश पेश किए थे.जो सैटेलाइट पृथ्वी के करीब चक्कर लगा रही है, उसे ऊपर से नीचे के ऑर्बिट ले जाया जाता है.
ताकि यह 25 सालों के भीतर स्वाभाविक रूप से वायुमंडल में फिर से प्रवेश कर सके. इसे ’25-वर्षीय नियम’ भी कहा जाता है. जैसे ही सैटेलाइट वापस पृथ्वी की ओर गिरना शुरू करेगा, हवा के घर्षण से निकलने वाली गर्मी सैटेलाइट को जला देगी, जिससे वह सतह पर पहुंचने से पहले ही खत्म हो जाएगा.धरती के इस पॉइंट पर है ‘अंतरिक्ष यानों का कब्रिस्तान’25-वर्षीय नियम को लेकर एक गाइडलाइन का खास ध्यान रखा जाता है.
अगर जांच में पाया जाता है कि सैटेलाइट से चोट या संपत्ति के नुकसान की संभावना 10,000 में 1 से भी कम है, तो उसे धरती पर ऐसे ही गिरा दिया जाता है. लेकिन नुकसान की संभावना ज्यादा होती है, तो ‘नियंत्रित डीऑर्बिट’ की आवश्यकता होती है. इसमें इंजीनियर सैटेलाइट के बचे हुए ईंधन का इस्तेमाल इसे धीमा करने और दिशा देने में करते हैं, जिससे वह अपने ऑर्बिट से बाहर निकालकर प्रशांत महासागर में गिर जाता है. यह पॉइंट निमो कहते हैं.पॉइंट निमो वो जगह है जो भूमि से सबसे दूर है.
इसका नाम जूल्स वर्ने की किताब ‘ट्वेंटी थाउजेंड लीग्स अंडर द सी’ के प्रसिद्ध पनडुब्बी नाविक के नाम पर रखा गया है. अनुकूल जगह होने की वजह से, इस पॉइंट पर 1970 से अब तक 300 से ज्यादा सैटेलाइट को डुबाया जा चुका है. 2031 में रिटायर होने के बाद अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) को भी यहीं पर डुबाने का प्लान है. इस सब की वजह से पॉइंट निमो को ‘अंतरिक्ष यान कब्रिस्तान’ के तौर पर भी जाना जाता है.
अंतिरक्ष की ‘कब्रिस्तान ऑर्बिट’सभी सैटेलाइट वायुमंडल में आसानी से नहीं जल सकते. कुछ सैटेलाइट धरती के बहुत ऊपर होती हैं. इनको धीमा करने के लिए बहुत ज्यादा ईंधन की जरूरत होती है, जिससे उनके मिशन लाइफ में काफी कमी आएगी. इसलिए, इस तरह के सैटेलाइट को पृथ्वी पर बुलाने की बजाय अंतरिक्ष की ‘कब्रिस्तान ऑर्बिट’ तक ले जाया जाता है.ये सैटेलाइट अपने आखिरी समय में ईंधन जलाते हैं और पृथ्वी से 22,400 माइल्स की ऊंचाई पर जाते हैं. यह ऑर्बिट एक्टिव सैटेलाइट के ऑर्बिट से 300 किलोमीटर की ऊंचाई पर होता है.
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