ग़ज़ल
चराग अम्न का यारों जला दीजिए,
खौफ दिल से अब तो हटा दीजिए।
सभी घर मे उजाले की हो हुकूमत,
अंधेरा सारे जग की दूर भगा दीजिए।
बचपन की फुलझड़ी यौवन के फटाके,
अभावों को दुलत्ती दिखा दीजिए।
आँगन में गुंजन कोयल की कूके,
दर – दर मे रंगोली सजा दीजिए।
जो मांग सूनी है , जो कोख खाली,
मजबूर दिल को राहत की दवा दीजिए।
भीड़ है शोर है हर गली मे आजकल,
शहरे बीमार को अब हवा दीजिए।
कौम के दुश्मन चार तरफ खड़े हैं,
इन दुश्मनों की जमीन हिला दीजिए।
मैं हूँ गुनहगार , मुजरिम तेरी नजर में,
मन के माफिक मुझको सजा दीजिए।
पता नहीं कब आके बहार चला गया,
सब्र की अर्ज पे मुस्कान खिला दीजिए।
नौशाद अहमद सिद्दीकी, सब्र,
भिलाई तीन
पदूम नगर,
जिला दुर्ग,
छत्तीसगढ़
9301584627





