अमलेश्वर। आस्था, श्रद्धा और पारंपरिक उत्साह के साथ कमरछठ यानी हलषष्ठी पर्व मनाया गया। महिलाओं ने सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना कर अपनी संतान की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना की। इस दौरान सैकड़ों महिलाएं व्रत और पूजा में शामिल हुईं।
शिवपार्क कालोनी, झंडा चौक में कमरछठ व्रत कथा आचार्य धर्मेन्द्र शर्मा जी द्वारा किया गया इस दौरान श्रीमती वेणुका चंद्राकर, वीणा चंद्राकर, पूनम साहू, सरस्वती वर्मा, अलका चंद्राकर, सुजाता वर्मा, दीप्ति साहू, रोहिणी मिश्रा, इंदु साहू, रेणु लखेरा, निशा साहू, श्रीमती शर्मा, श्रीमती देवांगन श्रीमती भोंसले, श्रीमती चौहान व कॉलोनी के अन्य महिलाएं अधिक संख्या में कमरछठ पर्व के सामूहिक पूजन कार्यक्रम में उपस्थित रही।
सुबह से ही शिव पार्क कालोनी, अमलेश्वर, सांकरा, पाहाद, परसदा, खुडमुडा, सहित अनेक स्थानों पर महिलाओं की भीड़ जुटने लगी थी। पारंपरिक वेशभूषा में पहुंची महिलाओं ने विधि-विधान से पूजा-अर्चना की और कमरछठ पर्व की सदियों पुरानी परंपराओं का निर्वहन किया। महिलाओं ने सगरी बनाकर उसमें पारंपरिक पूजन सामग्री अर्पित की तथा षष्ठी माता की पूजा कर अपने बच्चों के स्वस्थ, सुखी और दीर्घ जीवन की कामना की।
कमरछठ या हलषष्ठी पर्व छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक परंपरा और मातृत्व की आस्था से जुड़ा प्रमुख पर्व है। भादो मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाए जाने वाले इस पर्व पर माताएं अपनी संतान की दीर्घायु के लिए निर्जला अथवा परंपरा अनुसार व्रत रखती हैं। पूजा के दौरान सगरी बनाने, भैंस के दूध, दही और घी से पूजन करने के साथ ही लाई, महुआ, तिल, अरहर सहित पारंपरिक सामग्री का भोग अर्पित किया गया।
पर्व की एक विशेष परंपरा यह भी रही कि इस दिन हल से जोते गए खेतों में उपजे अनाज का उपयोग नहीं किया जाता। पूजा-अर्चना के बाद महिलाओं ने परंपरा के अनुसार पसहर चावल और विभिन्न प्रकार की भाजियों से तैयार प्रसाद ग्रहण कर व्रत का पारण किया। पुराणों और लोकमान्यताओं के अनुसार हलषष्ठी पर्व का संबंध भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई भगवान बलराम से भी माना जाता है। भगवान बलराम का प्रमुख अस्त्र हल था, इसलिए इस तिथि को हलषष्ठी के नाम से जाना जाता है। छत्तीसगढ़ में यही पर्व कमरछठ या खमरछठ के रूप में विशेष श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है।







