दुर्ग। अमलेश्वर। छत्तीसगढ़ शासन नगरी प्रशासन एवं विकास विभाग, मंत्रालय महानदी भवन नवा रायपुर अटल नगर द्वारा प्रदेश के नगरी निकायों में पदस्थ 93 उप अभियंताओं की स्थानांतरण सूची 18 सितंबर को जारी की गई थी। इस सूची में नगर पालिका परिषद अमलेश्वर में पदस्थ उप अभियंता प्रवीण साहू का नाम भी शामिल था, जिनका स्थानांतरण नगर पंचायत पाटन किया गया था। शासन के नियमों के अनुसार किसी भी शासकीय अधिकारी को 15 दिवस के भीतर नवीन पदस्थापना स्थल पर कार्यभार ग्रहण करना अनिवार्य होता है।
लेकिन हैरानी की बात यह है कि स्थानांतरण आदेश जारी हुए करीब 80 दिन बीत जाने के बाद भी इंजीनियर प्रवीण साहू ने नगर पंचायत पाटन में अभी तक कार्यभार ग्रहण नहीं किया है। वह अब भी नगर पालिका परिषद अमलेश्वर में ही “अंगद की तरह पैर जमाकर” बैठे हुए हैं। जबकि उनके स्थान पर पूर्व में पदस्थ इंजीनियर ढालेंद्र ठाकुर की भी पोस्टिंग हो चुकी थी, जिन्हें बाद में वापस अमलेश्वर लाया गया।
एक पार्षद द्वारा स्थानांतरण आदेश मीडिया को उपलब्ध कराते हुए यह जानकारी साझा की गई कि नियमानुसार इंजीनियर को अब तक नवीन पदस्थापना स्थल पर उपस्थित हो जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसको लेकर नगर के कई जनप्रतिनिधियों में भारी नाराजगी देखने को मिल रही है। उनका कहना है कि आखिर किस वजह से एक स्थानांतरित अधिकारी अब भी अमलेश्वर में जमे हुए हैं, यह समझ से परे है।
नगर में अब इस मुद्दे को लेकर चर्चा तेज हो गई है। लोगों का आरोप है कि नगर पालिका परिषद अमलेश्वर की मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीएमओ) नगर की मूलभूत सुविधाओं जैसे सड़क, नाली, पानी और बिजली की मांग को लेकर आने वाली जनता को नियमों का हवाला देकर लौटा देती हैं। उनका कहना होता है कि अवैध कॉलोनियों में नगर पालिका नियमों के अनुसार कोई सुविधा नहीं दी जा सकती। लेकिन वहीं सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर किस नियम के तहत ढाई महीने पहले स्थानांतरित हुए इंजीनियर प्रवीण साहू को अब तक रोके रखा गया है।
नगरवासियों और जनप्रतिनिधियों का यह भी आरोप है कि इंजीनियर प्रवीण साहू द्वारा लोगों को नियमों का हवाला देकर गुमराह किया जाता है। मूलभूत सुविधाओं की मांग को लेकर लोग नगर पालिका के चक्कर काटते नजर आते हैं, लेकिन अधिकारी और कर्मचारी जनप्रतिनिधियों के फोन तक नहीं उठाते। इस तानाशाही रवैये से जनता और जनप्रतिनिधि दोनों ही परेशान हैं। हैरानी की बात यह है कि सत्ता पक्ष के पार्षदों में भी इस मुद्दे को लेकर खुली नाराजगी देखी जा रही है।
वहीं नगर पालिका अध्यक्ष दयानंद सोनकर ने भी दो टूक शब्दों में कहा है कि “इंजीनियर प्रवीण साहू जाने का नाम ही नहीं ले रहा है।” अब बड़ा सवाल यह खड़ा हो रहा है कि क्या शासन के स्थानांतरण आदेश केवल कागजों तक ही सीमित रह गए हैं? और क्या जिम्मेदार अधिकारी नियमों से ऊपर हो गए हैं? अब देखना होगा कि नगरी प्रशासन इस पूरे मामले में क्या कार्रवाई करता है, या फिर नियमों का पाठ सिर्फ जनता और जनप्रतिनिधियों को ही पढ़ाया जाता रहेगा।
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