शरद पूर्णिमा पर्व को लेकर विभिन्न वर्गों की अपनी-अपनी मान्यताएं और संकल्प हैं. महिलाओं के लिए यह अखंड सौभाग्य और संतान प्राप्ति की इच्छा की पूर्ति का पर्व है. जो लोग कमजोर, बीशरद पूर्णिमामार और शारीरिक पीड़ा से पीड़ित हैं वे इस तिथि पर स्वस्थ होने की प्रार्थना करते हैं. इस दिन, तंत्र साधक चंद्र ऊर्जा को आकर्षित करने के लिए रात के चौथे पहर में नदियों और झीलों के तट पर कई दीपक जलाते हैं. मान्यताओं के अलावा वैज्ञानिकों ने भी इस पूर्णिमा को खास माना है, जिसके पीछे कई सैद्धांतिक और वैज्ञानिक तथ्य छुपे हुए हैं. इस पूर्णिमा के दिन चावल और दूध से बनी खीर चांदनी रात में रखी जाती है और सुबह 4 बजे उसका सेवन किया जाता है. इससे रोग दूर होते हैं और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है.
एक वैज्ञानिक शोध के अनुसार इस दिन दूध से बनी चीजों का सेवन चांदी के बर्तन में करना चाहिए. चाँदी में उच्च प्रतिरोध होता है. इससे वायरस दूर रहता है. शरद पूर्णिमा के दिन हर किसी को कम से कम 30 मिनट तक स्नान करना चाहिए. इस दिन बनाया गया वातावरण अस्थमा के रोगियों के लिए विशेष लाभकारी माना जाता है.
एक अध्ययन के अनुसार शरद पूर्णिमा के दिन औषधियों की कंपन क्षमता अधिक होती है. अर्थात् आकर्षण के कारण औषधियों का प्रभाव बढ़ जाता है, जब अन्दर का पदार्थ सांद्र होने लगता है तो निर्वात से एक विशेष प्रकार की ध्वनि उत्पन्न होती है. जो व्यक्ति चांदनी रात में सुबह 10 बजे से 12 बजे के बीच छोटे कपड़े पहनकर घूमता है उसे ऊर्जा मिलती है. सोमचक्र, नक्षत्र चक्र और आश्विन के त्रिनेत्र के कारण शरद ऋतु से ऊर्जा एकत्रित होती है और वसंत ऋतु में दब जाती है.
वैज्ञानिकों के अनुसार दूध में लैक्टिक एसिड और अमृत तत्व होता है. यह तत्व किरणों से बड़ी मात्रा में ऊर्जा अवशोषित करता है. चावल में स्टार्च की मौजूदगी इस प्रक्रिया को आसान बनाती है. इसी कारण ऋषि-मुनियों ने शरद पूर्णिमा की रात को खीर खुले आसमान में रखने की सलाह दी है.
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