अमलेश्वर। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी अम्लेश्वर में बड़े धूमधाम से गौरी गौरा पूजा किया गया। जिसमें समाज सेवक महेंद्र साहू शामिल हुए, और उनकी अगुवाई में गौरी गौरा पूजन का कार्यक्रम चला। नगर के विभिन्न चौक, चौराहा से होकर गुजरते हुए और पूजन की जयकार करते हुए यह प्राचीन तालाब पर विसर्जन के लिए पहुंचा जहां हजारों की संख्या में लोग थे।
समाज सेवी महेंद्र साहू ने बताया कि गौरी-गौरा पूजा का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। यह पूजा त्रेतायुग की उस पौराणिक कथा से प्रेरित है जिसमें शिव-पार्वती का विवाह धूमधाम से संपन्न हुआ था।जो शिव-पार्वती के विवाह का प्रतीक है. दीपावली के दिन कुंवारी मिट्टी से गौरी-गौरा की मूर्तियों का निर्माण कर रातभर विवाह के अनुष्ठान किए जाते हैं और अगले दिन नदी या तालाब में उनका विसर्जन किया जाता है।
महेंद्र साहू ने आगे बताया कि मिट्टी से बनते हैं शिव-पार्वती की मूर्तियां इस पर्व में शाम को गांव के लोग मिलकर गांव के बाहर मिट्टी लेने जाते हैं और उसी मिट्टी से शिव-पार्वती की मूर्तियां बनाते हैं। साथ ही ग्रामीण लोक गीत, नृत्य और वाद्य यंत्रों की धुन पर उत्सव का उल्लास मनाते हैं. गौरी-गौरा के इस पर्व में गंडवा बाजा विशेष आकर्षण होता है, जिसमें दमऊ, सींग बाजा, ढोल, गुदुम, मोहरी, मंजीरा, झुमका, दफड़ा और ट्रासक बजाए जाते हैं. पुरुष वाद्य यंत्र बजाते हैं और महिलाएं गौरी-गौरा लोकगीत गाती हैं. माना जाता है कि इस दौरान देवता ग्रामीणों पर सवार होते हैं, जिससे पूरे माहौल में भक्तिभाव और उल्लास का संचार हो जाता है।
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