काला सच न्यूज़, अमलेश्वर। भक्त माता कर्मा की जयंती पर अमलेश्वर के साहू समाज ने भव्य ज्योति कलश यात्रा के साथ बड़ी धूमधाम से माता कर्मा की जयंती मनाई, इस अवसर पर साहू समाज के वरिष्ठ नागरिकों सहित स्थानीय नेतागण भी मौजूद रहे।
ओम प्रकाश साहू नगर पालिका अमलेश्वर के उपाध्यक्ष ने बताया कि साहू समाज द्वारा भक्त माता कर्मा जयंती बड़े ही धूमधाम से मनाई गई,सुबह से ही उत्साह का माहौल रहा। विधि विधान के साथ पूजा पाठ करने के बाद ज्योति कलश की यात्रा अमलेश्वर के विभिन्न नगरों से गुजरते हुए साहू समाज भवन में आई।
साहू समाज के प्रमुख महेंद्र साहू ने बताया कि हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी भक्ति माता कर्मा की जयंती पर विविध कार्यक्रम रखा गया है साहू समाज के नवनिर्मित भवन में समाज के लोगों का मिलन हुआ। देर रात तक चले इस कार्यक्रम में समाज के वरिष्ठ लोगों तथा बड़े बुजुर्ग और बच्चों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया वह भक्त माता कर्मा की भक्ति में लीन रहे।
समाज प्रमुख धर्मेंद्र साहू ने बताया कि भक्त माता कर्मा जयंती की तैयारी दो महीना से चल रही थी इस दौरान साहू समाज का नवनिर्मित भवन भी बनकर तैयार हुआ है उन्होंने आगे बताया कि अमलेश्वर नगर में साहू समाज की संख्या बहुत है तथा कर्मा जयंती बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।
भक्त माता कर्मा की कहानी
आज लगभग 1000 वर्ष पहले, बहुत ही सम्पन्न तैलकार रामशाह के यहां एक सुकन्या ने जन्म लिया। नामकरण की शुभ बेला में पिता रामशाह उनका नाम कर्माबाई रखा।चंद्रमा की सोलह कलाओं की तरह कर्मा बाई उम्र की सीढ़ियां पार कर गई। परिवार से धार्मिक संस्कार तो मिला ही था, इसलिए बचपन से भगवान श्रीकृष्ण के भजन-पूजन आराधना में ही विशेष आनंद मिलता था।
समय के साथ नरवर के एक समृध्द तैलकार के परिवार में कर्माबाई की शादी हुई। पति महोदय के अत्यधिक आमोद प्रियता से किंचित कर्माबाई दुखी रहती थी, परंतु पति व्यवहार को शालीनतापूर्वक निभाते हुए यही कोशिश कर रही थी कि पति महोदय भी ईश्वर चिंतन की ओर आकृष्ट हो जाए। एक दिन पूजा-पाठ से रुष्ट होकर पति महोदय ने पूछा, मैं साफ-साफ कहना चाहता हूं, तुम्हें किससे सुख मिलता है, पति सेवा में या ईश्वर सेवा में। बड़े ही शांति स्वर में कर्माबाई ने कहा- मुझे वही कार्य करने में सुख मिलता है, जिसमें आप प्रसन्न रहें। यही पत्नी का धर्म है। इस प्रकार अपने शांत, धार्मिक प्रवृत्ति, पत्निव्रता धर्म से अपने पति के हृदय में भगवान के प्रति अनुराग पैदा करने में सफल रही। समय के साथ सुखी जीवन में पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई।
इसी समय कर्मा माता की परीक्षा की दूसरी घड़ी आई। नरवर के नरेश के प्रिय सवारी हाथी को असाध्य खुजली का रोग हो गया। बड़े-बड़े राजवैद्यों की नाड़ी ठंडी हो गई। इसी बीच किसी दुष्ट ने राजा को सुझाव दिया कि कुण्डभर तेल में हाथी को नहलाया जाए तो हाथी पूर्णरूप से ठीक हो जाएगा। फिर क्या था, राजा का आदेश तुरंत प्रसारित किया गया। महीना भर कुण्ड भरा न जा सका।
जागरूक सामाजिक नेता होने के कारण, पति महोदय का चिंतित होना स्वाभाविक था। पति को चिंतित एवं कारण जानकर कर्मा माता भी चिंतित हो गई।सारे तैलिक समाज की इात को बचाने के लिए, भगवान श्रीकृष्ण को अंतरात्मा की पूरी आवाज लगा दी। सचमुच ही भगवान की लीला से कुण्ड भर गया, सारा आकाश भक्त कर्मा की जय-जयकारों से गूंजने लगा।
उसी समय भक्त कर्मा ने पतिदेव से निवेदन किया कि अब हम इस नर निशाचर राजा के राज में नहीं रहेंगे और सारा तैलिक वैश्य समाज, नरवर से झांसी चला गया। आज भी नरवर में एक भी तैलिक नहीं मिलेगा, परंतु झांसी में हजारों तैलिक परिवार मिलेंगे। समय चक्र से कोई नहीं बचा है, अचानक अस्वस्थता से पति का निधन हो गया, पति के चिता के साथ सती होने का संकल्प कर लिया। इसी समय आकाशवाणी हुई। यह ठीक नहीं है, बेटी तुम्हारे गर्भ में एक शिशु पल रहा है, समय का इंतजार करो मैं तुम्हें जगन्नाथपुरी में दर्शन दूंगा। समय के साथ घाव भी भर जाते हैं, कुछ समय बाद दूसरे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। तीन चार वर्ष बीतते-बीतते बार-बार मन कहता था, मुझे भगवान के दर्शन कब होंगे। निदान एक भयानक रात के सन्नाटे में भगवान को भोग लगाने के लिए कुछ खिचड़ी लेकर पुरी के लिए निकल पड़ी। चलते-चलते थककर एक छांव में विश्राम करने लग गई, आंख लग गई, आंख खुली तो माता कर्मा अपने आपको जगन्नाथपुरी में पाई।
आश्चर्य से खुशी में भक्तिरस में डूबी, खिचड़ी का प्रथम भोग लगाने सीढ़ियों की ओर बढ़ी। उसी समय पूजा हो रही थी। पुजारी ने माता कर्मा को धकेल दिया इससे माता कर्मा गिर पड़ी। रोते हुए माता कर्मा पुकारती है- हे! जगदीश आप पुजारियों की मरजी से कैद क्यों है? आपको सुनहरे कुर्सी ही पसंद है, क्यों? तुरंत आकाशवाणी हुई, कर्मा मैं प्रेम का भूखा हूं। मैं मंदिर से निकल कर आ रहा हूं।
भगवान श्रीकृष्ण कर्मा के पास आए और बोले- कर्मादेवी, मुझे खिचड़ी खिलाइए। माता कर्मा भाव विभोर होकर खिचड़ी खिलाने लगी भक्त माता को भगवान ने कहा- हम तुम्हारे भक्ति से प्रसन्न हो गए हैं कुछ भी वरदान मांगो। माता ने कहा मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस आप मेरी खिचड़ी का भोग लगाया करें। मैं बहुत थक चुकी हूं मुझे आपके चरणों में जगह दे दीजिए। इस प्रकार भगवान के चरणों में गिरकर परमधाम को प्राप्त हो गई। तब से भगवान जगन्नाथ को नित्य प्रतिदिन खिचड़ी का भोग आज तक लग रहा है। वही खिचड़ी जो महाप्रसाद कहलाती ।।। साभार।।।
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